गुनाहों की सजा इसी जन्म में मिली (हास्य-व्यंग)

गुनाहों की सजा इसी जन्म में मिली (हास्य-व्यंग)

विवाहित जीवन गुजर रहा था सुख-शांति से
बहुत दिनों से पति-पत्नी में नहीं कोई तकरार
मगर पति बेचैन बिन खटपट के कैसी ज़िन्दगी
कुछ तो बिगड़े संतुलन है अब इसकी दरकार

मदहोश तारों की बारात गगन भी मस्त मौला
रात्रि के आगोश में छाई थी मधुर चांदनी रात
रोमांटिक पति को था इन्हीं पलों का इंतज़ार
थाम कर हाथ पत्नी का बताई दिल की बात

हे स्वप्न सुंदरीं, चाँद-सूरज मिलते नहीं कभी
विचित्र कुदरत का नियम अजीब है ये क़ायदा
मगर कभी-कभीं ख्याल आता है मेरे दिल में
तुमसे शादी करके मुझे हुआ है एक फायदा

सुनकर बात पति की अधीर पत्नी सकपकाई
तनिक खुलकर बोलो क्यों व्यथा शरमाते हो
दिल के दबे राज को जुबान खोलने दो आज
छेड़कर बात फायदे की क्यों मुझे भरमाते हो

सकुचाकर पति बोला गठबंधन करके मुझसे
तुम्हारी तो मुरझाई हुई ज़िन्दगी जैसे खिल गयी
हे देवी, मगर मेरे अनाथ गुनाहों की सजा मुझे
तुम्हारे पल्लू बंधकर इसी जनम में मिल गयी

(किशन नेगी ‘एकान्त’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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