गुफ़्तगू हो गई ख्वाब से

सजी महफ़िल ख़्वाबों की,
चांदनी रात के आँचल तले।
इसी आँचल ने पाला इनको,
इसकी छाँव में ही पले।
संगीत की मादकता में,
उधर ख्वाब थिरक रहे थे।
आबशार बनकर बा-दस्तूर,
इधर पैमाने छलक रहे थे।
ख़ामोशी थी चिर निद्रा में,
मदहोशी का था आलम।
कोई किसी की प्रियतमा,
कोई किसी का था बालम।
थिरक रहा था मैं भी,
पकड़ कर हाथ में प्याला।
ख़्वाबों में भी ना देखी,
ऐसी उन्मत्त मधुशाला।
पूछा मैंने एक ख्वाब से,
क्या देखा है कभी ख्वाब?
मुस्कुराकर उसने दिया,
मेरे कौतुक प्रश्न का ज़वाब।
देखते नहीं हम ख्वाब कभी,
ख्वाब दिखाते हैं इंसानों को।
देख हमें पूरा करते हैं जो,
अपने अधूरे अरमानों को।
तुम्हें भी हमने न्योता है,
आकर तुम्हारे ही ख़्वाबों में।
जहाँ तैरते हैं तुम्हारें सवाल,
उलझे धागों के जवाबों में।

(किशन नेगी ‘एकांत’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

2 Replies to “गुफ़्तगू हो गई ख्वाब से”

  1. मुझे होली पर एक सुंदर कविता चाहिए था क्या मिल सकता है

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