गज़ल

भरोसा किया था जिन पर, वही आज पराये हो गए,
अपने ही क़दमों के निशान, न जाने कहाँ खो गए |

मिटाने चले थे हस्ती हमारी, मगर खुद ही मिट गए,
अपनी ही सजाई महफिल में, ज़नाब खुद ही पिट गए|

कदम जो पड़े उनके मयखाने में, शराब बरसने लगी,
आँखों से उनकी पीने को, आज ग़ज़ल भी तरसने लगी।

चल कर तेरी महफ़िल में, आज खुद शबाब आया है,
एक हाथ में ग़ज़ल और एक हाथ में शराब लाया है।

वो आयी जब मेरी मज़ार पर, मुर्दे भी मचलने लगे,
बिजली लगी चमकने, दीवाने बादल भी गरजने लगे।

दीवानों से बचाकर रखना, खुदा का दिया हुआ शबाब,
जनाज़ा जब निकले मेरा, छिड़क देना थोड़ा-सा शराब।

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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