चलो आज फिर दिल को मनाया जावे

चलो आज फिर दिल को मनाया जावे

चलो आज फिर दिल को मनाया जावे

यादों की  किश्ती को  सजाया  जावे।

 

यूँ  नंगे बदन  कब तक  चलोगे, यारों

चलो फिर किसी का कफन चुराया जावे।

 

इस शहर को और भी सजाया जाये

हर लाश को चौक पे  बिठाया जाये।

 

यह गुजरात है यहाँ क्या किया जाये

मैकदा  अब घर को ही बनाया जाये।

 

जला दिया जाता है हर घोंसला यहाँ

क्यूँ  न इस चमन को जलाया जाये।

 

पढ़कर गजल बहुत जो रोना आ गया

क्यूँ  ना  इसे अश्क से  मिटाया जाये।

 

पर- शिकस्ता हूँ  यह जान लो,  हवाओं

अब सोचो कि मुझे किधर उड़ाया जाये।

 

माना कि  मेरी कलम  सूरते-शमशीर है

चलो पढ़ना किसी इक को सिखाया जाये।

 

चलो इस शहर को फिर से जगाया जाये

कल का  अखबार  फिर बिकवाया जाये।

 

जिस दरो-दीवार पे खामोशी लिखी है

अच्छा हो  उसे ही  खटखटाया जाये।

 

पाजेब की खामोशी कब तक सुनोगे

जंजीर की आवाज को जगाया जाये।

 

इधर जिस्म के  जलने की  बू आती है

चलो, दहेज इसी शहर में जलाया जाये।

—-      भूपेंद्र कुमार दवे

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