चल उड़ जा रे भँवरे

चल उड़ जा रे भँवरे

चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी
जिसे चूम तू इतराता था ,सो गयी वो कलियों की रानी
जिस ताल किनारे तू उड़ता था, सूख गया उसका पानी
वीरान हुआ तेरा आशियाना, लिखनी है इक नई कहानी
चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी

सूरज ढल जाए इससे पहले, तुझको अब है जाना
बना ले कोई नया बसेरा, और ढूंढ ले नया ठिकाना
यहां न कोई अब तेरा अपना, हर कोई हुआ बेगाना
याद आएंगी वो गलियां, जहाँ बीती तेरी जवानी
चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी

जिस पर बैठ गुनगुनाया तूने, अब सूख गई है वो डाली
जहाँ चांदनी मुस्कुराती थी, अब घनी रात छाई है काली
भूल जा बचपन के संग-साथी, ढूंढ ले कोई नया माली
चेताया तुझको बार-बार मैंने, पर बात मेरी तूने न मानी
चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी

कैसे भूलेगा उन रातों को, जब देखे तूने रंगीन सपने
कितना तड़पेगा तू जब, बिछुड़ जायेंगे सब तेरे अपने
जिनके संग उड़ा धूप में, अब न आएंगे संग तेरे तपने
कहाँ बसेगी नई दुनिया तेरी, क्या तूने मन में है ठानी
चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी

टूट गए अरमान तेरे और, उजड़ गई तेरी मधुशाला
जहाँ जमती थी महफ़िल तेरी, पी मधुरस का प्याला
जवानी हुई थी मदहोश, और तू हुआ था मतवाला
बहुत रोयेगा तू भँवरे, जब भूल न पायेगा यादें पुरानी
चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी
(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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