चहकने लगी शराब (ग़ज़ल)

जब से मिली तेरी सोहबत, चहकने लगी शराब,
देख तेरी परवाज़ अब्र में, चहकने लगी शराब।

फ़लक से जो उतरा शबाब, चमन-ए-दहर में,
पाकीज़ा खुशबु से उसकी, महकने लगी शराब।

तेरी शोखियाँ से मुत्तासिर, पैमाने छलक गए,
जाम ने जो छुआ होठों को, बहकने लगी शराब।

जल रही थी चिंगारियां जब, दो दिलों के दरमियाँ,
चिंगारी एक यहाँ भी गिरी, दहकने लगी शराब।

बड़े बेआबरू होकर, तेरे मयखाने से जो निकले,
सितारों को देख गर्दिश में, सिसकने लगी शराब।

महताब की तबस्सुम पे, इतना मत इतरा ‘ एकांत,
गुफ्तगू जो हुई आफ़ताब से, मचलने लगी शराब।

(किशन नेगी ‘एकांत’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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