चापलूसी

मेरी कुछ पंक्तिया है आजकल जो बहुत चापलूसी चलती है उसके उपर, शायद यह कविता किसिको पसंद ना आये, पर आप जरा आपने इर्द-गिर्द़ गौर से झांकोगे तो शायद आपको इस कविता का आशय समज सकोगे, कृपया पूरा पढे ओर् पसंद आये तो जरुर शेअर करे

*चापलूसी*

हमने देखा है,
नाकामियों को बहुत कुछ मिलते हुये,
और काम करनेवालों को हमेशा उम्मीद मिलते हुये,

यहा चापलूसीवालों का होता है हमेशा जयजयकार,
उनको ही मिलती है बढाव और बोनस मेरे यार

खासीयत होती है उनमे कुछ खास,
चाटने से ही मिलती है उने खुशी का एहसास

बिचारे काम करनेवाले काम ही करते रहते है,
स्वाभिमान हमेशा आपने पास ही रखते रहे.

अफसोस है,
जो पोजिशनसे उपर गया वो चापलूसी करकेही गया,
नीचेसे जो उपर आया वो उसकी चापलूसी करके ही आया,

आवाज उठायी जिसने चापलूसी के खिलाप,
उसके स्वाभिमान को चापलूसी ने कर दिया पूरा साफ

(स्वाभिमानीयों के लिये)
ना छोडो कभी अपना स्वाभिमान करता हू गुजारिश
आपनेभी बाग मे गिरेगी एक दिन सुनहरी बारिश

उन्हे आपने काम पे नही है विश्वास,
बस चाटते रहो यही है उनका ध्यास.

ऐसे परवाह नही करते है कभी किसीकी,
ओर बात करते है बिकी हुई स्वाभिमानकी.

ना जाने कब बंद होगी ये चापलूसी
शायद एक बढी शिक्षा मिल जाये उन्हे अपने आपकी.

– प्रमोद पवार

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