जगत जननी हो तुम (महिला दिवस विशेषांक)

नारी तुम कभी अबला नहीं थी,
त्याग तपस्या की दिव्य मूरत हो,
सृष्टि का अंकुर बोया हो जिसने,
तुम उसकी एक विचित्र सूरत हो।

ममता का तुम शीतल आँचल हो,
नयनों से करुणा का सागर हो,
हिमालय शीश झुकाता तुमको,
तुम अनुराग से भरा गागर हो।

उत्साह तुम्हारा अम्बर को चूमता,
दिल महासागर की गहराई है,
हिमालय से अंतरिक्ष तक तुमने,
अपनी विजय पताका फहराई है।

तुम्हारे पलकों की निर्मल छाँव में,
चाँद और सूरज निर्भीक सोते हैं,
स्नेह के आँचल तले पुचकारती,
जब-जब लाडले तुम्हारे रोते हैं।

क्यों कहते तुमको अबला नारी,
तुम तो जगत की तारणहार हो,
मूर्ख मानव अब तक न समझा,
तुम्हीं तो जगत की पालनहार हो।

शत-शत नमन तुमको हे नारी,
तुम इस जगत की भव्यता हो,
जिस मानव समाज को जन्मा,
उस समाज की तुम सभ्यता हो।

(किशन नेगी एकांत)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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