जबसे तुमसे दूर हुए

जबसे तुमसे दूर हुए हर बात अधूरी लगती है।

हँसना भी महफ़िल में एक मजबूरी लगती है।

 

वैसे तो लोगों के करीब अक्सर ही रहता हूँ मैं।

पर सच कहूँ खुद से भी खुद की दूरी लगती है।

 

बीते लम्हातों में जब ये दिल मेरा खो जाता है।

आँखों के गुलशन में तू लता-कस्तूरी लगती है।

 

वो बातों में हाथों से हाथों को सहलाती तपिश।

जुल्फों में छुपे चेहरे पर चाँद सी नूरी लगती है।

 

कभी रूठते कभी मनाते कभी मासूम शरारत से।

होती है सुबह हसीन और शाम सिंदूरी लगती है।

 

मेरे लहू की हर  बूँद तेरे जिस्म की अमानत है।

मेरी सांसों से ज्यादा तेरी सांसे जरुरी लगती है।

 

तुम बिन बिखर गया हूँ  मैं आईने सा जमीं पर।

बस साथ जो तुम हो, ये ज़िन्दगी पूरी लगती है।

 

तुम बस अधूरी आस रहे,दोष नहीं  है तुम्हारा प्रिय।

हम मिल न सके इसमें शायद रब की मंजूरी लगती है।

 

जबसे तुमसे दूर हुए हर बात अधूरी लगती है।

हँसना भी महफ़िल में एक मजबूरी लगती है।

 

वैभव”विशेष”

3 Replies to “जबसे तुमसे दूर हुए”

  1. “मेरे लहू की हर बूँद तेरे जिस्म की अमानत है।

    मेरी सांसों से ज्यादा तेरी सांसे जरुरी लगती है।”
    अत्यंत सुन्दर पंक्तिया सर जी।
    Kee up

  2. आप “विशेष” हो और “विशेष” लिखते भी हैं।
    अत्यंत सुन्दर।

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