जब भी लिखूं सत्य लिखूं

जब भी लिखूं सत्य लिखूं

व्योम की अनन्त गहराई में लिखूं
या धरा की सूक्ष्म बिंदी में लिखूं।

बस जब भी लिखूं सत्य लिखूं
न किसी पाबन्दी में लिखूं।

कवि की कल्पना न बंट पाये
कभी मजहब की दीवारों सी।

फिर नज्म कोई उर्दू में लिखूं
या गीत कोई हिंदी में लिखूं।

वैभव”विशेष”

One Reply to “जब भी लिखूं सत्य लिखूं”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.