जब भी लिखूं सत्य लिखूं

जब भी लिखूं सत्य लिखूं

व्योम की अनन्त गहराई में लिखूं
या धरा की सूक्ष्म बिंदी में लिखूं।

बस जब भी लिखूं सत्य लिखूं
न किसी पाबन्दी में लिखूं।

कवि की कल्पना न बंट पाये
कभी मजहब की दीवारों सी।

फिर नज्म कोई उर्दू में लिखूं
या गीत कोई हिंदी में लिखूं।


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