जब रहबर-ए-कामिल खुद ही राह भटकाए

जब रहबर-ए-कामिल खुद ही राह भटकाए,
तब मंज़िल का पता उसे भला कौन बताए ?

समंदर के गिर्दाब में फंसी हो जब कभी कश्ती,
इस तूफां में माँझी तब कैसे उसे पार लगाए?

जरूरी नहीं कि हर मुसाफ़िर को सही रास्ता मिले,
तमाम हैं जो भटके तो फिर कभी लौट के ना आए |

गुमान भी शागिर्द बन बैठा है कामयाबी का ,
बहुत कम लोग हैं यहाँ जो इससे हैं बच पाए |

गर मज़बूत हो इरादा और यकीं खुद पर तो,
किसकी है जुर्रत यहाँ जो उसे राह से डिगाए ?

मेरी शायरी से –

About ओम हरी त्रिवेदी

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य , मानव होना भाग्य है तो कवि होना सौभाग्य . . . नाम- ओम हरी त्रिवेदी शिक्षा - स्नातक +तकनीकी डिप्लोमा जन्म स्थान - बैसवारा लालगंज , रायबरेली (उत्तर प्रदेश) व्यवसाय - शिक्षक

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