जिंदगी तेरा फिर से शुक्रिया कि

ऐ ज़िन्दगी
तूने कहा चल और
मैं चला उन राहों में
बिछाए थे तूने जहाँ
अनगिनित चट्टानी पत्थर
मैंने ठोकर खाई, गिरा और
फिर सम्भला अपने ही पावों पर
जिंदगी तूने कहा कर्म कर
उन पगडंडियों पर चल कर
काँटों के जंगल जहाँ बिछाए थे तूने
मैं चला, पावं हुए रक्तरंजित
पर मैं रुका नहीं, डिगा नहीं,
चलता रहा निरन्तर अपने कर्मपथ पर
बनकर कर्मठ कर्मयोगी
बनकर कर्मशील बटोही
जिंदगी तूने कहा उड़
नील गगन में उन पंखों के सहारे
लहूलुहान कर दिया था जिन्हें तूने
मगर मैं उड़ा, गिरा, फिर उड़ा
बैठकर उत्साह के चांदनी मंगल रथ पर
लगा के सुवर्णमय अलौकिक पंख
अद्भुत उमंग और विलक्षण जोश के और
छू लिया माथा मग़रूर गगन का
चीर कर सीना ख़ौफ़नाक बादलों का
मगर ज़िन्दगी शुक्रिया तेरा कि
सीखा तुझसे ही मैंने
बादलों का सीना चीरना
बाधाओं से जूझना, और
पथरीले एवं काँटों भरे रास्तों पर चलना
जिंदगी तेरा फिर से शुक्रिया कि
राह दिखाई तूने विजयपथ की

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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