जिन्दगी

जिन्दगी 

कभी अपनी, कभी बेगानी

कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी।

जानी पहचानी दुनिया में

नित नव रूप लिये मिलती है जिन्दगी।

 

बचपन में अनाथ-सी बेबस

जवानी में ठगी मिलती है जिन्दगी।

बूड़ी साँसों की खाई में

लहूलुहान हुई दिखती है जिन्दगी।

 

चुभती हैं बेरहम साँस तो

बड़ी छटपटाती मिलती है जिन्दगी।

लड़खड़ाती, डगमगाती-सी

बैसाखी थामे चलती है जिन्दगी।

 

समय सहम जाता है जब भी

अंतिम साँस को तरसती है जिन्दगी

कभी अपनी, कभी बेगानी

कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी।

 

मीठी] तीखी कभी कसैली

जहर उगलती लगती है जिन्दगी।

कभी गरीबी में शर्माती

कभी गरीबों पर अकड़ती है जिन्दगी।

 

थमती साँसों को देखकर

बिछुड़ती, अलविदा कहती है जिन्दगी।

खुद पे रोती, सब पे हँसती

दुनिया से दूर सरकती है जिन्दगी।

 

मौत के छलकते जामों से

बूँद बूँद पीने मिलती है जिन्दगी।

कभी अपनी, कभी बेगानी

कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी।

 

मौत के पलने पलकर बढ़ी

अब मौत के नाम डरती है जिन्दगी।

कभी किस्मत को कोसती है

या फिर खुद ही पे चिढ़ती है जिन्दगी।

 

अंत में बर्फ की सिल्ली पर

बेसुध पिघलती मिलती है जिन्दगी।

या फिर मुस्कराती दूर से

धुआँ सा उड़ाती दिखती है जिन्दगी।

 

दूर अनंत के झरोखों से

शून्य से झाँकती दिखती है जिन्दगी।

कभी अपनी, कभी बेगानी

कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी।

               ——- भूपेन्द्र कुमार दवे 

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