जिम्मेदारी का अहसास

कुछ वर्ष पहले
नीम का एक नन्हा पौंधा
उगाया था मैंने अपने घर के आँगन में
तब वह नन्हे बालक की भांति
खेलता था हवा के झोंकों से
मतवाली हवा भी
सहलाकर उसके कोमल पत्तियों को
थी झूमती खिलखिलाकर
रिमझिम बरसात की बूंदों से
अटखेलियाँ करना उसे भाता था
उन बूंदों के कोमल स्पर्श से
खिल उठता था, भीग कर उन बूंदों में
अबोध बालक की तरह किलकारियाँ मारता
मैं उसका बहुत ध्यान रखता था
समय पर पानी देना
समय पर खाद देना
जैसे मेरी दिनचर्या थी
उसके मासूम गालों को सहलाकर
असीम आनंद
अनंत हर्ष की अनुभूति होती थी
बहुत ही नटखट, बहुत ही चंचल स्वभाव
बहुत ही चुलबुला
पतझड़ में जब उसकी पत्तियाँ झड़ती तो
मैं उसकी नूतन कोंपलों के आने का
बेसब्री से करता इंतज़ार
होता है कभी-कभी अहसास मुझे कि
उसका बचपन जिया मैंने भी
उसका हमजमात बनकर
नीम का वह तरु
अपने अल्हड बचपन को पीछे छोड़
आज बड़ा हो गया है
अब वह लोगों को धूप में
शीतल छावं देता है
राही उसके पत्तों को
औषधि के लिए प्रयोग करते हैं
मगर उसने कभी आपत्ति दर्ज नहीं की
नन्ही-नन्ही गिलहरियाँ
उसकी शाखाओं पर चढ़कर
खेलती हैं लुका-छिपी और
वह बस मुस्कुरा देता है
उसे पता है कि वह अब बालक नहीं
बल्कि एक समझदार वृक्ष है
आज वही नन्हा पौंधा
बहुत ही शांत, विनम्र, गंभीर मुद्रा में
विचारशील, बुद्धिसम्पन्न, सुसंस्कृत भाव से
है निहारता राहगीरों को
शायद उसे अपनी ज़िम्मेदारियों का
अहसास होने लगा है

(किशन नेगी ‘एकान्त’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.