जीवन नदिया, मन है कश्ती

” जीवन नदिया, मन है कश्ती “

ये जीवन है क्या ?
एक बहती नदिया की धारा-सा !
कभी शांत तो कभी चंचल ,
कभी उजला तो कभी अनमिट अँधेरा-सा !
ये जीवन है क्या ?
एक बहती नदिया की धारा-सा !

जीवन की इस नदिया पर ,
तैरती मानव मन की ये कश्ती ,
कभी ख़ुशी की लहरों संग
इठलाती-मुस्कुराती हुई ,
शांति और सुकून से बहती ,
तो कभी दुःख की लहरों से
टकराती-डगमगाती हुई ,
निराशा के गर्त में डूबती ये कश्ती !

दिग्भ्रमित मानव मन की ये कश्ती ,
न दिशा का है कोई ज्ञान ,
अनजानी राहों से परेशान ,
मंज़िल तक न पहुँच पाने से हैरान !
फिर भी ईश्वर है वो दिव्य ज्योति ,
जो दिखाए सही राह हमें ,
इस कश्ती की पतवार है उनके हाथों में ,
वही तो है एक खेवैय्या ,
जो पार लगाए जीवन की नैय्या !

जीवन नदिया, मन है कश्ती ,
दोनों की डोर थामे है जो हस्ती ,
उन्हें कहते हैं हम ईश्वर ,
जिनमें हमारी दुनिया है बसती !

– सोनल पंवार

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