जीवन-पथ

जीवन-पथ

 

जब जिस पथ पर तू चलता है

मैं भी  उस पथ पर चलता हूँ

 

जिन पत्थर को तू ठुकराता

उनसे  टकराता  चलता हूँ

जिन पर  तेरा लहू लगा है

मैं उन काँटों से  उलझा हूँ

 

हैं  अग्निपथ  पर  चिन्ह  तेरे

जिसे देख  मैं  बस  चलता हूँ

जब जिस  पथ पर तू चलता है

मैं  भी  उस पथ पर चलता हूँ

 

नहीं छाँव है, पेड़ नहीं पर

तेरी  साया  ढूँढ  रहा हूँ

दूर बहुत है चलना लेकिन

मैं तो थककर चूर हुआ हूँ

 

आस  लिये  कुंठित  हृदय में

कंपित    कदमों  चलता  हूँ

जब जिस पथ पर तू चलता है

मैं भी  उस पथ पर चलता हूँ

 

बाँध रखा है  तूने  मुझको

कैसे  इसकी  गाँठें  खोलूँ

पथ की बाधा बढ़ी चली है

यह कैसे  मैं  तुझसे बोलूँ

 

बंधन  तो  अभिषाप  बना है

श्रापित  होकर  भी  चलता हूँ

जब जिस पथ पर तू चलता है

मैं भी उस पथ पर चलता हूँ

 

नाशपथ है या अग्निपथ यह

जिसपर साँसें झुलस रही हैं

आहों के  मेले  में  चलते

शव सी साँसें सुलग रही हैं

 

पर    नादानी  मेरी   देखो

मैं  हँसते  हँसते  चलता  हूँ

जब जिस पथ पर तू चलता है

मैं भी  उस पथ पर चलता हूँ

 

तेरे  पदचिन्हों  पर   चलना

अंगारों   पर  है  जलना-सा

गिरकर उठना, उठकर गिरना

जीवन  पथ   है   संघर्षों-सा

 

फिर  भी  तेरे  बहकावे  में

मैं  आँख  मूँदकर  चलता हूँ

जब जिस पथ पर तू चलता है

मैं भी  उस पथ पर चलता हूँ।

 

—-      ——-     —-      भूपेंद्र कुमार दवे

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