जूठन

समन्दर भर ही रही हूँ आजतक, जबसे तूने चाहा किसी को,
तब ये आंसू चेहरा खिलने से आते थे.
अब तो कोई भी टूटन काफी है.
तेरी गिला भी मिट जायेगी जब जानेगा तू,
मनाने को तुझे एक रुठन ही काफी है.
ना चाहिए हमें तेरे जिंदगी भर के साँसों का बहाना,
बस तेरे प्यार का जूठन ही काफी है.

श्रेयस अपूर्व “मगरिब”
भोपाल

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