जो तुमसे मुलाकात हो गई

जो तुमसे मुलाकात हो गई

गए थे मयख़ाने हम, ज़िन्दगी के ग़म भुलाने को,
भूले ग़म सारे जहाँ के, जो तुमसे मुलाकात हो गई!

रात के अँधेरे में देखा जब, तेरा चाँद-सा मुखड़ा,
मेरी वीरान ज़िन्दगी में, फिर से चांदनी रात हो गई!

झील-सी नीली आँखों से, जब बरसने लगे मोती,
बादल तो गरजे नहीं, मगर क्यों बरसात हो गई!

तेरी जुल्फों के साये में, खुद को भूल गए थे हम,
तू खोई थी तन्हाई में और हमें हवालात हो गई!

तन्हाई में तेरे बिन, करवटें लेकर गुजरी है रातें,
जिंदगी के खेल में, ज़िन्दगी ही शह-मात हो गई!

कवी बन गया हूँ, क़ैद हूँ जबसे तेरी मधुशाला में,
मेरी सांसें कलम और तेरी आंखें दावात हो गई!

तेरे हुस्न का मंज़र देख, जनाज़े पर जनाज़े निकले,
एक जनाज़ा अभी निकला, फिर कोई वारदात हो गई!

जब तू गुजरती बाज़ार से, कारवां निकला भवंरों का,
हुस्न के साथ-साथ जैसे, सितारों की बारात हो गई!

गए थे मयख़ाने हम, ज़िन्दगी के ग़म भुलाने को,
भूले ग़म सारे जहाँ के, जो तुमसे मुलाकात हो गई!

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

2 Replies to “जो तुमसे मुलाकात हो गई”

    • Hi Bhuvan Ji, bahut bahut dhanyavaad evam abhaar.
      sandarbh hamesha ham sabke Charon or mandrate rahte hai, bas lapkne ka avsar dhundhta hun. bura mat manna. meri tarah bawala kavi ye sab kah deta hai.
      abhaar sahit

      kishan

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*