ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ,

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ,
खबर नहीं जिसकी, मिल गयी।

हवा ने उठाया, घूँघट चाँद का,
रात में चांदनी जैसे, खिल गयी।

मैंने माँगा था, फ़क़त हाथ उसका,
थमाकर वह कम्वख्त, दिल गयी।

कदम उसके पड़े, मेरी गली में,
जमीं मेरे खाबों की, हिल गयी।

पहले उधेड़ी उसने, ज़िन्दगी मेरी,
फिर मेरी ही खाल से, सिल गयी।

(किशन नेगी ‘एकांत’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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