तुम और मच्छरदानी

तुम और मच्छरदानी

रात की नीरवता में
तुम्हारा तन
विश्रामावस्था में
शांत और शिथिल
बिस्तर पर पड़ा
आहिस्ते-आहिस्ते
गहन निद्रा में लीन
तुम्हारे भीतर दबी
वासनाएं/कुंठाए/कामनाएं
उभरती, आकार लेती
अवचेतन मन में रचती
स्वप्न संसार का माया जाल
वास्तविक से लगते
सुख-दुःख में डूबती, उपलाती
लौट जाती तृप्ति पाकर
अंतरिक्ष में
मेरे ही अनगिनत छिद्रों से
फिर कोई
इच्छाओं के कीट-पतंगे
प्रवेश न कर सके
दंश न चुभो सके
रात भर चौकीदारी करता
अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष के
चार स्तंभों पर टिका
चार दिशाओं में तना, खड़ा
साक्षी बनता
तुम्हारे उस स्वरुप का
जिस पल तुम
अन्दर-बाहर से होते एक समान
जय पराजय से मुक्त
मेरे भीतर के आकाश में
शुद्धतम अवस्था में
तुम आंशिक मृत्यु को प्राप्त होते
फिर जन्म लेने के लिए
स्फूर्ति से भरे
दिन की शुरुआत के लिए
मेरा नेपथ्य में जाना
तुम्हारा मंच पर आना
हाँ, अभिनय तो
तुम्हें ही करना है
जबतक की तुम
मुक्त न हो ज़ाओ

— पूनम सिन्हा

About पूनम सिन्हा

M.Sc. Zoology

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