तुम समझो गर मुझको अपना

तुम समझो गर मुझको अपना

 

तुम समझो गर मुझको अपना

पूरा   होगा   मेरा   सपना।

 

आँधी से  भी  बातें होंगी

तू  नैय्या में  बैठा  होगा

लहरें ऊँची  उठा करें पर

बस में तेरे सब कुछ होगा

दूर  किनारा  हटता  जावे

पर  तू  मेरे  सन्मुख होगा

नैय्या  मेरी  डूबे  तो भी

गहराई  में  तू  ही  होगा

मेरा मन  विचलित  ना होवे

यही ध्यान तुम हरदम रखना।

 

तुम समझो गर मुझको अपना

पूरा   होगा   मेरा   सपना।

 

तेरी  खुशबू  पाकर  ही  मैं

तेरी  बगिया  रहा   करूँगा

फूल  बनूँ  या  शूल बनूँ पर

तेरा  ही   गुणगान  करूँगा

पतझर में  भी शुष्क डाल पर

अंतिम  साँसें  गिना  करूँगा

तोड़  मुझे  तू  फैक कहीं भी

उफ् न करूँगा, कुछ ना कहूँगा

करूँ साधना  चाहे जिस क्षण

यही ध्यान तुम हरदम रखना।

 

तुम समझो गर मुझको अपना

पूरा   होगा   मेरा   सपना।

 

चलता हूँ  जिस जिस पथ पर

उस पथ की  सब पीर हटाना

सफर सफल हो या ना हो पर

मंजिल स्थल  की याद दिलाना

चलते चलते  थक  जाऊँ  तो

मुझे   उठाकर  कदम  बढ़ाना

कहीं  रात  भी  हो  जावे तो

हाथ   हमारा   थामे   रखना

थर-थर काँप रही आशा को

भींच  मुठ्ठी में  बाँधे रखना।

 

तुम समझो गर मुझको अपना

पूरा   होगा   मेरा   सपना।

 

मेरी  जीवन  गाथा  के तू

अक्षर अपने  हाथों लिखना

धुंधली  पीड़ित  सारी  बातें

अपनी प्रिय वाणी में लिखना

मैं  पीड़ित हो चीख पडूँ तो

तुम बस  धीरज बाँधे रखना

अंतिम साँसों की गिनती कर

मेरी   गाथा   पूरी  करना

नहीं  अमर मैं  हो पाऊँ तो

शव को  अपने काँधों रखना

 

तुम समझो गर मुझको अपना

पूरा   होगा   मेरा   सपना।

—-      ——-     —-      भूपेंद्र कुमार दवे

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2 thoughts on “तुम समझो गर मुझको अपना

  1. “नहीं अमर मैं हो पाऊँ तो

    शव को अपने काँधों रखना”
    सुन्दर पंक्तिया सर जी

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