तेरा बदन

तेरा बदन

तेरा बदन मुझ में समा जाता है।

यु रात के दुझे पहर तक जब नींद नही आती है,
करवट बदल-बदल कर जब थकावट सी छा जाती है।
जब घडी की टिक-टिक से भी आवाज छन-छन की आती है,
जब रोजाना के उसी बासी कम्बल से खुशबु इत्र की आती है।।
जब पलकें भारी होने लगती है,
और नींद आँखों में बसने लगती है।
ऐसे में प्रियतमा तेरा ख्याल मुझे आता है,
और कोई ख्वाब तुझे मेरे करीब ले आता है।।
तेरा फितूर फिर मुझ पर हावी हो जाता है,
और निःस्वार्थ प्रेम का पूरा ज्ञान धरा रह जाता है।
इश्क़ की तपिश में पिघल कर मेरा बदन तुझमे समा जाता है,
इश्क़ की तपिश में पिघल कर तेरा बदन मुझमे समा जाता है।।
***नि-3कलाल***

About Nitin Kalal

From Dungarpur (raj.) Work at Kherwada... i like to express my fillings by poems... I'm not so good like other writers but always try to learn and trying to being perfectionist. gmail- ni3kalal@gmail.com contact no.-8107440773

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