तो ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)

तो ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)

 

तेरी शोखियाँ से मुतास्सिर उफ़क़ भी, तो खुदा खैर करे,
और खुदा को हो जाये तुझसे राक्बत, तो ख़ुदा खैर करे।

तेरे सपनों को सजाया मैंने, अपने अहसासों के रंगो से,
मगर ख्वाबों में तू किसी गैर के आये, तो ख़ुदा खैर करे।

कफ़न ओढ़े लेटा हूँ मज़ार में, तुझे पाने की हसरत में,
कब्र पर मेरी आंसू कोई गैर बहाये, तो ख़ुदा खैर करे।

तराशा है जिस पत्थर को मैंने, रात-रात भर जाग कर,
बन जाये वह किसी गैर की मूरत, तो ख़ुदा खैर करे।

जिस दामन को बचाया मैंने, हर बार जमाने की नज़रों से,
वो लहराए किसी गैर की चाहत को, तो ख़ुदा खैर करे।

जब-जब ठोकरें खोई तूने, मेरी बाहों ने संभाला हर बार,
सिमट जाए तू किसी गैर की बाहों में, तो ख़ुदा खैर करे।

तेरी आँखों की मधुशाला में, रंगीन शामें गुजारी है मैंने,
नशा किसी गैर के सर चढ़ कर बोले, तो ख़ुदा खैर करे।

तेरी हर आहट पर, खिड़की पर गुजारी हैं मैंने कई रातें,
तेरे दीदार को इंतज़ार कोई गैर करे, तो ख़ुदा खैर करे।

तेरी गर्म साँसों को मैंने, महसूस किया है बहुत करीब से,
तपन में इनकी अगर कोई गैर ज़ले, तो ख़ुदा खैर करे।

तेरा एक दीदार की चाहत मैं, बहुत जख्म खाये हैं मैंने,
उन जख्मों पर मरहम कोई गैर लगाए, तो ख़ुदा खैर करे।

आयी थी वो मेरी कब्र पर, हुस्न की बिजली गिराने को,
बिजली गिरे किसी गैर की कब्र पर, तो ख़ुदा खैर करे।

उसके सपनों को सजाया मैंने, अपने अहसासों के रंगो से,
ख्वाबों में वो किसी गैर के हो ‘एकांत’, तो ख़ुदा खैर करे।

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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