थकी प्रार्थना

थकी प्रार्थना

थक गई प्रार्थना हो निष्फल
सो गई साधना पूर्ण विफल
अब क्यूँकर दीप जले निश्चल
अब क्या मंदिर में पैर धरू?

अब किस दर्शन की आस करूँ
अब किस मधु से विषघट भर लूँ?

सभी आस निरास बन बैठी
सुख की घड़ियाँ पीड़ा में ऐंठी
मिली न वरदानों की लाठी
अब किसको माला गुँथकर दूँ?

अब किस दर्शन की आस करूँ
अब किस मधु से विषघट भर लूँ?

आँसू अब मुझसे शरमाते
पलको में आ थम थम जाते
पीड़ित मन भी कहता जावे
कितने दुख को अपना समझूँ?

अब किस दर्शन की आस करूँ
अब किस मधु से विषघट भर लूँ?

ठग की जमघट-सा हर क्षण है
मृत्यु तुल्य जीवन का कण है
जिसमें हर पल बस घर्षण है
अब क्यूँ साँसें श्रद्धा की लूँ?

अब किस दर्शन की आस करूँ
अब किस मधु से विषघट भर लूँ?

उर कहता है साँसें भर लो
धड़कन गति हुछ धीमी कर लो
संघर्षों से खुश मन कर लो
पर शूल चुभन शुभ क्यूँ समझूँ?

अब किस दर्शन की आस करूँ
अब किस मधु से विषघट भर लूँ?

अंतहीन दुख का बन साथी
जले कहाँ तक जीवन बाती
बात धुँए की समझ न आती
क्यूँ आरती मनोहर कर लूँ?

अब किस दर्शन की आस करूँ
अब किस मधु से विषघट भर लूँ?

हर क्षण तो मरकर जीते हैं
भय से सब डर कर जीते हैं
बार बार मरकर जीते हैं
आस्था का अब क्यूँ पाठ पढूँ?

अब किस दर्शन की आस करूँ
अब किस मधु से विषघट भर लूँ?

जब तृप्ति शिथिल-सी हो जावे
थकित मन कुछ सोच ना पावे
कर्मरत भी रहा ना जावे
तब किस भक्ति का श्रंगार करूँ

अब किस दर्शन की आस करू
अब किस मधु से विषघट भर लूँ?
…..भ्रूपेन्द्र कुमार दवे
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