दिल की बात

दिल की बात

दिल की बात कहने को अभी न दिल ही चाहता
मतलबी दिलों को दर्द सुनाना नहीं चाहता

या खुदा ये दुनिया में अपना ही मुँह चुप रखें
मुश्किल जो है दुसरों को देना नहीं चाहता

परेशानी खुद की उन्हे कितनी उलझा रखे
उन को आवाजे दे पछताना नहीं चाहता

बदलते जमाने के साथ अब बदलना होगा
न कोई पूछता, ना ढूँढे और नहीं चाहता

ग़म बटोर संवारने लगा गया अब अकेला
जज्बात बज़ार में मज़ाक बने नहीं चाहता

लिख-लिख कर ‘कलम’ खूद आंसुओं से धो लेता
हालात पे कुछ लिखने का बहाना ही चाहता

कलम उठाइ मैंने इस डर से छुटकारा पाने
बेरुखी अब तकलीफदेह हो नहीं चाहता

क्योंकि अपनापन महज़ एक ढोंग ,दिखावा
गुरूर में मगरूरों की सलाम नहीं चाहता

पहले मिलतीे ‘अक्ल’ सजन तो बात और होती
मगरूरों को यों समझाना भी नहीं चाहता

सजन

One Reply to “दिल की बात”

  1. लग रहा है जैसे कबी मेरे मन की बात को उजागर कर दी।

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