दिल में इक है टीस बरसों से दबी

दिल में इक है टीस,
बरसों से दबी,

मैं वो बादल हूँ,
जो बरसा ही नहीं,

हो गई धंधली,
जो इक तस्वीर थी,

दिल से तेरी याद,
भी तो जाती नहीं,

हो गया है खामोश,
ये सारा जहान्,

कोई भी आवाज़,
मुझको बुलाती नहीं,

हर तरफ है तान,
सुरों ने छेङ दी,

कोई भी झन्कार,
मुझको लुभाती नहीं,

बीच में हूँ आज मैं,
सबके यूं खङा,

बुत बना हूँ या तो,
मुझमें प्राण नहीं,

ठहराव ही ठहराव,
बस, शेष रह गया,

कोई भी तरंग अब,
इसे हिलाती नहीं,

जान कर ही छेङ दो,
कोई नया सरगम “विराज”,

या मान लूं तुम्हें भी,
इसकी तालिम नहीं….

विरन्दर सिहं ‘विराज’

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"Poet"

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