दीदार-ए-हुस्न

दीदार-ए-हुस्न
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हरकत थी हलचल थी,
बस्ती में आज चहल-पहल थी,
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बेकाबू हो रही थी धड़कनें,
जैसे दिल में कोई उथल-पुथल थी,
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आशाएं थी उसे देखने की,
लेकिन चेहरे पर चादर मखमल थी,
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हर और मंजर था तबाही का,
पर यहाँ प्रकृति जैसे शीतल थी,
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हर किसी की कोई हसरत थी,
पर देखने की लालसा कठिन तो कभी सरल थी,
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प्रार्थना, मिन्नतें, बन्दगी, सब हो रही,
तुझे पाने की राह ही बड़ी जटिल थी,
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इक तमाशा था हो रहा,
जैसे जिंदगी में सबके तु शामिल थी,
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कोई पुकारता भी कैसे उस वक़्त तुम्हें “”विराज़””
जब उसे देखने की अभिलाषा ही तुम्हें हासिल थी…..
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हरकत थी हलचल थी…..
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# विराज़

About "विराज़"

"Poet"

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