दीप जलाऊँ तेरे संग

दीप जलाऊँ तेरे संग

खुशियों और उमंग से भरा दीप लड़ियों का दीपावली है त्यौहार ,
मन हो रहा है उदास उन मासूमों की खतिर ,
नहीं है पास जिनके कोई साधन जो मनाएं वो भी एक बार ख़ुशी से त्यौहार ,
क्या लाऊँ ,क्या बनाऊँ सूची बनाने  को मन फिर भी है बेक़रार ,
मिटटी के दिए अपने द्वार जलाने को लायी हूँ मैं इस बार ,
मन में थे यह विचार हो जायेंगे रोशन शायद उनके भी  आँगन और द्वार ,
जिनके मिटटी से सने हाथों ने दिया इन दीयों को रूप और आकार ,
चमकती ,सजी दुकानों को छोड़ पीछे ले आयीं मैं शगुन के बर्तन ,
जो सजा कर बैठे थे छोटी सी दुकान को बस एक फिट के फुटपाथ पर,
सोने के नहीं, चांदी के नहीं, लाई  हूँ मैं मिटटी के भगवान घर अपने इस बार ,
शायद ऐसा करने से उन मासूम आँखों भी चमक जाएं चांदी से  इस बार ,
नकली सुगंधों से भरे फूल मालाओं को मैं छोड़ आई हूँ बाजार में इस बार ,
ख़ुशबुओं से भरे फूलों की लगाउंगी मैं माला अपने द्वार ,
टिमटिमाती बिजली की लड़ियों नहीं जलाऊँगी इस बार ,
मन में सोचा और ले आई हूँ मोमबत्ती के कुछ बण्डल मैं इस बार ,
जिनको तराशा है किसी मासूम से नेत्रहीन के हाथों ने ,
मन में है ख़ुशी और बहुत सा है सुकून यह सोचकर ,
शायद मैंने अपने संग किसी के घर को भी किया रोशन इस बार  ……
आओ सब मिलकर मनाएं इसी तरह से कुछ दीवाली और मनाएं हर त्यौहार  ॥

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