देखी थी जीवन की छवि प्यारी

देखी थी जीवन की छवि प्यारी
वह मोहक प्यार भरी ममता की
थी जिसमें हर प्रतिमा सुन्दर सी
भरती थी किलकारी बचपन की

पर अंतरपट में उभर रही थी
छवि यौवन की मदमस्त भँवर सी
जिसमें परछाई इठलाती थी
खुद से अनजानी अभिमानी सी

देखी थी तरुणाई जीवन की
विविध रंग की, विचित्र रूपों की
दर्पण में दर्शन नित करती सी
पर छवि दरक गई हर दर्पण की।

श्रंगार शून्य ले अंतिम क्षण की
आँसू के कलरव में छिपती सी
शर्माती, सकुचाती, अलसाई
सिहर उठी मुस्काती तरुणाई

देखी थी जीवन की चतुराई
जो शब्दकोश से सजी हुई थी
मगर बुद्धि सतत अर्थविहीन थी
जिससे मति-गति भी चकराई थी।

दर्प भरी अकुलाती वाणी थी
जाति पाँति का हर भेद बताती
नफरत की भी आग जगाती थी
सब सुन्दर सपने ठुकराती थी।

देखी थी जीवन की मधुशाला
जिसमें तरुणाई की थी हाला
लेकिन दरक गया कुछ पल में ही
वह कंपित हाथों आकर प्याला

बिखर गई सब आशा की मदिरा
बुझा सकी ना किंचित अभिलाषा
अश्रूधार की मदिरा से ही तब
भरती फिरती थी दरका प्याला।

देखी थी जीवन की फुलवारी
जहँ रमती थी मादक तरुणाई
पर वसंत पर थी पतझर भारी
मिटा गई हर महकाती क्यारी

कंटक सेज हर कही बिछी थी
कलियाँ टूट टूट बिखर चली थी
महक उमंग की अद्दश्य हुई थी
अधीरता थी पथ पर चुभती थी।

देखी थी साँसें भी मतवाली
आलिंगन करती अजर अमर सी
पर व्याकुल वह भी हो डठती थी
वह चलती अर्थी-सी लगती थी

वह हर करवट आहें भरती थी
पर मृत मिट्टी जीवित करती थी
हरपल मरकर जीवित होती थी
श्रंगार मरण का वह करती थी
…. भूपेन्द्र कुमार दवे
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