दोहे

राजस्थानी दोहे

चौमासो बरसो घणो, साजण याद सताय।
एक पल भी जुग लागे,बरसे रिमझिम हाय।।

काळी काळी बादली,आसमान पर छाय।
घर घर करती हे घटा, तू धरती पर आय।।

होरी खेल रही सखी,रंग मलमल लगाय।
फागण में भींगे घणी, मनड़ो भी हरसाय।।

बिजुरी चमके बावरी, हिवड़ो भी शरमाय।
बादल बरसे जोर सूं, पिया मिलन की आय।।

टाबर सगळा देख के,जीव में जीव आय।
खेलण में बिसरा न दे, हिवड़ा बैठे छाय।।

महँगाई ने कर दी, देखो नींद खराब।
सुरसा सी बढ़ती जाय, चले सियासी दाव।।

करसान बैठ रो रिया, देख राजनीत को खेल।
योजना कागज़ में छे,बढतो जावे मेल।।

कवि राजेश पुरोहित

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