दो दिन

दो दिन

हे मनु की संतान
तेरी ये ज़िन्दगी है
बस दो दिन की
एक दिन तेरे हक में और
दूसरा दिन तेरे खिलाफ
जब तेरे हक़ का दिन होगा
तू गुमान न करना
भाग्य और किस्मत
होंगी तेरी परछाईयाँ 
जिंदगी होगी मेहरबान
मगर पाँव तू जमीन पर ही रखना
जिस दिन ज़िन्दगी होगी तेरे खिलाफ
तू धीरज मत खोना, शांत रहना
मंडराएंगे निराशा के काले बादल
भाग्य और किस्मत भी रूठे होंगे
मगर आशा की ज्योति जलाये रखना
कर्मगति को विराम न देना
रहना होगा अग्रसर कर्मपथ पर

(किशन नेगी ‘एकांत’ )

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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