@ दो शब्द गरीबी से @

देख दुसरों पे संकट के काले काले बादल
क्यों खींच ली तूने अपनी ये आँचल
पाँव जिसका जमीं पे ठहरता नही
उसे छोड़ दिया यूं ही हो जाने को पागल

एक खिलखिलाते चेहरे को ऐसे रूलाना ठीक नही
ऐ गरीबी किसी गरीब को इस कदर सताना ठीक नही

इस दुनिया मे चेहरे हैं बहुत उनमे से कुछ मासूम है
तुम भी इतना अनभिज्ञ नही तुमको भी ये मालूम है
कोई खाते-खाते मरता है कोई खाना से महरूम है

जो खाते-खाते मरते हैं उनको खिलाना ठीक नही
ऐ गरीबी किसी गरीब को इस कदर सताना ठीक नही

एक अर्ज मेरी तू मान जरा एक-एक कर के सबके घर जा
तू अमीर के घर मे सुनेगी कुछ और भी पाने की चर्चा
पर गरीब तो उलझे होंगे लाएं कहाँ से अब खर्चा

अँधेर मे जलता हुआ दीपक बुझाना ठीक नही
ऐ गरीबी किसी गरीब को इस कदर सताना ठीक नही

नयनों मे नीर भरे रहते दिल मे गरीबी खलती है
कदम-कदम पर ठोकरें हीं खाने के लिये मिलती है
हालत अजब रहती उसकी तू जिसके साथ भी चलती है

दिल मे उमड़े इस दर्द को कुछ और बढ़ाना ठीक नही
ऐ गरीबी किसी गरीब को इस कदर सताना ठीक नही

@सत्येन्द्र गोविन्द (नरकटियागंज, बिहार)

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About Satyendra Govind

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