धीरे से उठाना

धीरे से उठाना

सदियों से गह्न निद्रा में , है सोया यह समाज़ ,

धीरे से उठाना I

युगों का अंधकार समेटे , है सोया यह समाज़ ,

धीरे से उठाना I

 

इसको सुबह की नहीं कोई ख़बर ,

युगों से सोया है यह बेखबर  I

भिन्नता में दबा इसका चित्‌  ,

समानता नहीं इसके मित I

 

सुलाया इसे इतिहास के थपेड़ों ने ,

कभी शासन की शमशीरों ने ,

कभी धर्मों की जंजीरों ने ,

तो कभी समाज के लुटेरों ने I

 

पीड़ी दर पीड़ी इसे मार पड़ी ,

युगों-युग इसकी कब्र गड़ी I

चाह के भी उठ ना पाएगा ,

जग कर भी जग ना पाएगा I

 

सोना इसका मुकद्दर है ,

यही मुझे अब बदलना है I

विजय इस डगर मत गभराना ,

बस , इसे धीरे से उठाना I

 

तुझे राह दिखाने आया हूँ ,

राह दिखा कर जाऊँगा I

तुझे जगाने आया हूँ ,

जगा कर ही अब जाऊँगा I

 

कष्ट जगने में इसको तनिक होगा ,

खफा मुझ पे यह अधिक होगा I

युगों-युग जिसने भी इसे जगाया है ,

इसने उसे ही मौत का जाम पिलाया है I

 

दिखा इसको रोशनी का संसार ,

कर दे इसकी रातों को बेकरार I

जब होगा इसको सुबह का इंतज़ार ,

तब होगा उठने को यह ख़ुद बेकरार I

 

…… यूई विजय शर्मा

About UE Vijay Sharma

Poet, Film Screenplay Writer, Storyteller, Song Lyricist, Fiction Writer, Painter - Oil On Canvas, Management Writer, Engineer

One Reply to “धीरे से उठाना”

  1. “तुझे राह दिखाने आया हूँ ,

    राह दिखा कर जाऊँगा I

    तुझे जगाने आया हूँ ,

    जगा कर ही अब जाऊँगा I

    कष्ट जगने में इसको तनिक होगा ,

    खफा मुझ पे यह अधिक होगा I

    युगों-युग जिसने भी इसे जगाया है ,

    इसने उसे ही मौत का जाम पिलाया है I”

    समाज की हकीकत आपने चन्द पंक्तियों में लिख दी।
    सुन्दर ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.