धुंध

 

धुंध

धुंध से प्रकृति का सौन्दर्य कुछ तो घटा है

पर हमारी नजरों में वह अद्भुत छटा है।

आज भी हमारे मन-मस्तिष्क की सोच से

गुलामी की धुंध का परदा नहीं हटा है।

आज भी हँस पड़ती है अंग्रेजी किताबें

देखकर हर बच्चे का बस्ता जो फटा है।

 

हर कहीं बस अंग्रेजियत ही दिख पड़ती है

सच हमारी संस्कृति का भाग्य ही फूटा है।

पर किसे दोष दें हम जब हमने अपनों को

अपने घर आँगन में, सड़कों पर लूटा है।

कृषकों को अंग्रेजी डंडों से पीटा है।

बच्चों, बूढों, बहुओं को घर में कूटा है।

 

धुंध में हमको सभी कुछ धुँधला दिखता है

आज पाप पुण्य है, पुण्यवान भी खोटा है।

अंग्रेजों-सा अक्खड़ हर बेटा दिखता है

पीकर अंग्रेजी शराब ‘पब’ में लेटा है।

अंग्रेजों-सा गाली अंग्रेजी में देता

वह तो अंग्रेज बना भारत का बेटा है।

 

धुंध से प्रकृति का सौन्दर्य कुछ तो घटा है

पर हमारी नजरों में वह अद्भुद छटा है।

आज भी हमारे मन-मस्तिष्क की सोच से

गुलामी की धुंध का परदा नहीं हटा है।

—- भूपेन्द्र कुमार दवे

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