नयनों से निकली मधुशाला

उन नयनों के क्या कहने
जहाँ से मधुशाला की नदिया बहती है
आंसुओं के मोती समेटकर
किसी टूटे हुए दिल का दर्द कहती है

शांत रेगिस्तान और चट्टानों से
गालों को छूकर कल-कल फिसलती है
धीरे-धीरे मधुर धुन में
अधरों पर मादक समंदर से मिलती है

अधरों के मोहक मंथन से
मनचले भंवरों की सांसें महकती हैं
सोमरस की मादकता से
मदहोश होकर बहारें भी बहकती हैं

(किशन नेगी ‘एकांत’ )

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