नवगीत

ओह, कितना शोर है अन्दर,
बाहर निश्चुप
कितने बिचारों का समागम
फिर भी जुवां है मौन
आवाज़ की इस दुनिया में
बेरहम हो गये शब्द
और मन सुन रहा
अपनी ही आवाज़ हरदम ।

मेरे बैचेन मन की आवाज़
धड़कन में बज रही
इन उठती गिरती स्वांसों से
मन के अन्दर दिल में
पल पल प्रतिपल हर पल
जिस की लय भी
और ताल भी,
नृत्य करते यादों में
अदृश्य होकर दृश्य भी ।

अपनी चीखें ,अपने रूदन
सोच के सागर में डुबा हुआ
खुद मन भंवर सा
और डुबता उभरता प्रतिक्षण
जग हंसाई का कारण
तमाश बन गया है मन ।

कानों में जब कोई प्यार की
सुनी अनसुनी आवाज़
किसी की हंसी-ठिठोली
वह आल्हाद के स्वर
तुफान उठाते मेरे भीतर
आतुर होने लगता है मन
तेरे स्वर सुनने को हो बैचेन ।

जिस की लय और ताल पर
चाहे थोड़ी देर ही सही
स्वांस के हिंडोले में
मुझे झूलना है
उठती गिरती धड़कनों से
अन्तिम होते जीवन सफऱ में
जैसे फंस गई हो नैया भंवर में ।

सजन

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