“नारी हूं मै “

जो ममता देती सबको,वो खुद
मां के प्यार को तरसी सी,
कभी जन्मी, कभी अजन्मी सी,
कही बोझ तो कही प्यारी हूं ‘मै’
हां “नारी हूं मै “…

कही फूल चढ़े है मंदिर मे,
कही बिकती,
फूल बनी गलियों मे..
जालिम सा संसार है देखो,
ज़हर छिड़कती कलियों मे..
बेची है सम्मान कही पर,
लोगो की रंगरलियों मे,
रोती,लाचार बेचारी हूं मै,
हां “नारी हूं मै ”

बाहर नज़रों से बचाकर,
घर मे पांव तले रखते हैं..
ना समझ सके,
क्या चीज़ हैं हम ?
बस चीज़ बनाकर रखते हैं..
कुछ के लक्ष्मी मोह के कारण,
खुद को आग लगाती लक्ष्मी..
आखिर क्यों ?
कही बोझ तो,
कहीं प्यारी हूं मै
और क्यों ? “नारी” हूं मै ..??

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