ना हुई

गुजर गए हैं कई साल जबसे तुमसे बात ना हुई,
हर एक समां में दिन तो था पर रात ना हुई.
वो दिन तो आज भी मुकम्मल सा ना हो पाया,
जिस दिन से तुझसे मिलन की सौगात ना हुई.
हर रात आता है बादल और भीगते भी हैं,
पर जो सच में भिगा दे वो बरसात ना हुई.
बदल रहा था जमाना और हम किसी और के हो गए,
पर किसी और की हो जाए, ऐसी मेरी जात ना हुई.

श्रेयस अपूर्व “मगरिब”
भोपाल

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