निर्भया

निर्भया

अहसास से ही काँप जाता मन ,
कहीं सुनसान इलाके किसी बियाबान अँधेरे में
लुटता किसी अबला का तन ,

करती कभी मिन्नतें, कभी हाथ जोड़ वह गिड़गिड़ाती
पर नहीं पसीजते वहशी दरिंदो के मन l

सुकोमल सी वह कांचन काया,
विधाता की अनुपम कृति,
जो हैं एक बहन, बेटी, बहू की स्मृति l

उसका यौवन सौन्दर्य ही बन गया उसके लिए अभिशाप,
किसे थी खबर कौन वहशी दरिंदा करेगा यह पाप l

क्या – क्या सपने बुने होंगे उसने जीवन के,
टुकड़े-टुकड़े कर दिए पापियों ने तन-मन के l

थर्रा उठता हैं रोम-रोम उस घृणित कुकर्म के बारे में सोच-सोच कर,
निश्चय ही वह होगा कोई वहशी पिशाच दरिंदा
जिसने दिए ऐसे जख्म कुरेद-कुरेद कर
कहना चाहती थी वह बहुत कुछ
पर जुबान साथ दे न सकी
कहती हैं ये थमती साँसे और उसकी बेबसी
कौन समझ सकता मेरे दर्द को
क्यों करती मैं ख़ुदकुशी ?

उसकी हर आह से, हर जख्म से बस यही आवाज निकलती हैं,
यह अति हैं वहशियत की अंत हैं दरिंदगी का
नही अधिकार इन वहशियों को ज़िन्दगी का l

यह मेरे लिए बहते आँसू तो समय पोंछ देगा
पर इस कुकर्म का इंतकाम कौन लेगा ?
मेरी हस्ति तो मेरे साथ ही मिट जाएगी
पर किसी को हैं क्या यकीं ?
हक़ीक़त यह दरिंदगी की भविष्य में इंसानियत को
फिर शर्मसार ना कर जाएगी,
ज़िन्दगी किसी निर्दोष की फिर तबाह न कर जाएगी,
या मेरी शहादत विधान में एक नया अध्याय लिख जाएगी l

अभी तो उड़ी थी वह जग में पंख पसार
उसका यौवन रूप सौन्दर्य ही बन गया उसके लिए
अनल अंगार,
हवा के झोंखो से तितर-बितर हुई लतिका सी वह सुकुमार
पड़ी हैं छिन्नाधार l

About ओम हरी त्रिवेदी

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य , मानव होना भाग्य है तो कवि होना सौभाग्य . . . नाम- ओम हरी त्रिवेदी शिक्षा - स्नातक +तकनीकी डिप्लोमा जन्म स्थान - बैसवारा लालगंज , रायबरेली (उत्तर प्रदेश) व्यवसाय - शिक्षक

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