निशिगंधा

निशिगंधा

घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा?

निस्तब्ध हो चली निशा, खामोश हुई दिशाएँ,
अब सुनसान हो चली सब भरमाती राहें,
बागों के भँवरे भी भरते नहीं अब आहें,
महक उठी है,फिर क्युँ ये निशिगंधा?
प्रतीक्षा किसकी सजधज कर करती वो वहाँ?
मन कहता है जाकर देखूँ, महकी क्युँ ये निशिगंधा?

घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा?

है कोई चाँद खिला, या है वो कोई रजनीचर?
या चातक है वो, या और कोई है सहचर!
क्युँ निस्तब्ध निशा में खुश्बू बन रही वो बिखर!
शायद ये हैं उसकी निमंत्रण के आस्वर!
क्या प्रतीक्षा के ये पल अब हो चले हैं दुष्कर?
मन कहता है जाकर देखूँ, बिखरी क्युँ ये निशिगंधा?

घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा?

यूँ हर रोज बिखरती है टूटकर वो निशिगंधा?
जैसे कोई विरहन, महकती गीत विरह की हो गाती!
आशा के दीप प्राणों में खुश्बू संग जलाती,
सुबासित नित करती हो राहें उस निष्ठुर साजन की,
प्रतीक्षा में खुद को रोज ही वो सजाती….
मन कहता है जाकर देखूँ, सँवरी क्युँ ये निशिगंधा?

घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा?

About Purushottam kumar Sinha

A Banker, working in Allahabad Bank. Having interest in Poem Writing and Reading. Living in Patna, Bihar शायद मन ही है यह मेरा......आपके समक्ष प्रस्तुत..... फिर सोचता हूँ कभी! मन क्या है? मन जैसी कोई चीज है भी क्या? खुशी के एहसास, दुःख का आभाष, शरीर के अन्दर होता हैं कहाँ? क्या तन्तुओ और कोशिकाओं मे? इन्हें कौन दिग्दर्शित करता है? शायद मन है क्या वह? सोचता हूँ कभी! मन का कोई आकार भी है क्या? ठोस, द्रव्य, नर्म, मुलायम या कुछ और? एहसास सुख के करता कहाँ? दुःख का आभाष होता इसे कैसे? मन टूटने पर पीड़ा तो होती है, पर टूटने की आवाज क्युँ नही होती? मन जैसी कोई चीज है भी क्या? सोचता हूँ कभी! पत्थर टूटे तो होता घना शोर, शीशा टूटने से होती चनकार सी, कागज फटने से होती सरसराहट सी, पत्तों के टूटने से होता मंद शोर, फूलों के मसलने की भी होती सिसकी, पर इस मन के टूटने से? मन के टूटने से उठती है कराह!!!!! मस्तिष्क के तार झंकृत हो उठते हैं, क्षण भर को शरीर शिथिल हो जाता है, पत्थरों के दिल भी भेद जाते हैं, आसमान से बूँद छलक पड़ते हैं, शायद मन सबसे कठोर होता है! शायद मन ही है यह मेरा......आपके समक्ष प्रस्तुत..... My Blogspot... कविता "जीवन कलश" https://purushottamjeevankalash.blogspot.com मुझे आप www.poemocean.com, www.hindilekhak.com पर भी पढ सकते हैं। M.No.+919507846018, +918967007431

2 Replies to “निशिगंधा”

  1. Hi Purshotam, after reading it, I recall my childhood days spent in village, when “NISHA’ would hide the sinking twilight under its lovely “AANCHAL”.
    likhte rahe ban kar kavi
    jab tak ast na ho dinkar

    kishan

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