न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम

तलाश में तेरी भटकते रहे हैं हम।

 

न किनारा अपना न किश्ती रही अपनी

तूफाँ से यूँ ही उलझते रहे हैं हम।

 

खुली जिल्द की सी किताब रही जिन्दगी

खुले पन्नों तरह बिखरते रहे हैं हम।

 

पूछा सच्चे दिल से तो दिल ने कहा

सुलझते सुलझते उलझते रहे हैं हम।

 

ख्याल में होती रही हर साँस की हार

शुष्क पत्तों तरह बिखरते रहे हैं हम।

 

कभी तो आयेंगे वो मेरी कब्र पर

यही सोच के बस मचलतेे रहे हैं हम।

——- भूपेन्द्र कुमार दवे

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