पत्थर से मोम

ऐ दोस्त, तुमने ये क्या कर दिया,
इस पत्थर में, प्राणों का संचार कर दिया,
कभी जो, इंद्रियों पर काबू न था,
आज वही स्वभाव उसने, मेरा शीतल कर दिया,

हंसने की सहमति, बन्द थी मुझको जैसे,
उसने खुशी का, उजाला कर दिया,
जो राह में, किसी को समझता न था,
आज उसी को, रास्ते का राही कर दिया,

उसने ही मेरे, सूर्य के तेज को,
शांत कर, चंद्रमा कर दिया,
जिसमें बदलाव, कोई कर ना सका,
तेरे दो बोलो ने, वो काम कर दिया,

हां तुने ही, मेरे स्वभाव को,
पत्थर से मोम कर दिया,
तेरी दोस्ती के, स्पर्श मात्र ने,
मुझे नव-शिखर तक, नया कर दिया…

‘विराज’

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