परिवेश

ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश….

जहाँ उड़ते हों, फिजाओं में भ्रमर,
उर में उपज आते हों, भाव उमड़कर,
बह जाते हों, आँखो से पिघलकर,
रोता हो मन, औरों के दु:ख में टूटकर…..
सुखद हो हवाएँ, सहज संवेदनशील परिवेश….

ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश….

जहाँ खुलते हों, प्रगति के अवसर,
मन में उपजते हो जहाँ, एक ही स्वर,
कूक जाते हों, कोयल के आस्वर,
गाता हो मन, औरों के सुख में रहकर……
प्रखर हो दिशाएँ, प्रबुद्ध प्रगतिशील परिवेश….

ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश….

जहाँ बहती हों, विचार गंगा बनकर,
विविध विचारधाराएं, चलती हों मिलकर,
रह जाते हों, हृदय हिचकोले लेकर,
खोता हो मन, अथाह सिन्धु में डूबकर…..
नौ-रस हों धाराएँ, खुला उन्नतशील परिवेश…..

ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश….

About Purushottam kumar Sinha

A Banker, working in Allahabad Bank. Having interest in Poem Writing and Reading. Living in Patna, Bihar
शायद मन ही है यह मेरा……आपके समक्ष प्रस्तुत….. फिर सोचता हूँ कभी! मन क्या है?
मन जैसी कोई चीज है भी क्या? खुशी के एहसास, दुःख का आभाष, शरीर के अन्दर होता हैं कहाँ?
क्या तन्तुओ और कोशिकाओं मे? इन्हें कौन दिग्दर्शित करता है? शायद मन है क्या वह?
सोचता हूँ कभी! मन का कोई आकार भी है क्या?
ठोस, द्रव्य, नर्म, मुलायम या कुछ और? एहसास सुख के करता कहाँ? दुःख का आभाष होता इसे कैसे? मन टूटने पर पीड़ा तो होती है, पर टूटने की आवाज क्युँ नही होती? मन जैसी कोई चीज है भी क्या?
सोचता हूँ कभी! पत्थर टूटे तो होता घना शोर, शीशा टूटने से होती चनकार सी, कागज फटने से होती सरसराहट सी, पत्तों के टूटने से होता मंद शोर, फूलों के मसलने की भी होती सिसकी,
पर इस मन के टूटने से?
मन के टूटने से उठती है कराह!!!!! मस्तिष्क के तार झंकृत हो उठते हैं, क्षण भर को शरीर शिथिल हो जाता है, पत्थरों के दिल भी भेद जाते हैं, आसमान से बूँद छलक पड़ते हैं, शायद मन सबसे कठोर होता है!
शायद मन ही है यह मेरा……आपके समक्ष प्रस्तुत…..

My Blogspot… कविता “जीवन कलश”
https://purushottamjeevankalash.blogspot.com
मुझे आप www.poemocean.com, www.hindilekhak.com पर भी पढ सकते हैं।

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