परों को रूबरू हो जाने दो

परों को रूबरू हो जाने दो

परों को रूबरू हो जाने दो आसमानों से,
ये जमीं सलामत है, सलामत रहेगी।
हार ही मिलती है जंग-ऐ-दिल में,पर,
ये तेरी हुकूमत है, हुकूमत रहेगी।
रोते हुए देख लेना हमारा हाल फिर से,
ये तेरी रहमत है, रहमत रहेगी।
बहुत से निगेहबान आये और माकूल से हो गए,
ये तेरी सल्तनत है, सल्तनत रहेगी।
आज भी गिर जाते हैं आंसू इन दरिया-ऐ-नैनन से,
ये तेरी बरकत है, बरकत रहेगी।
अब ले ही जाओ ये अपनी नवाबी हमसे ,
ये तेरी वसीयत है, वसीयत रहेगी।
सहेज रखी है जो याद ना मिट सकी हमसे,
ये तेरी मिल्कियत है, मिल्कियत रहेगी.
दरख़्त तो बस लगा से रखे हैं “मगरिब”, आ जाना,
ये तुम्हे इजाजत है, इज़ाज़त रहेगी।

श्रेयस अपूर्व
भोपाल

3 Replies to “परों को रूबरू हो जाने दो”

  1. आज भी गिर जाते हैं आंसू इन दरिया-ऐ-नैनन से,
    ये तेरी बरकत है, बरकत रहेगी।

    touching lines….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.