पर्वत का दुःख

पर्वत का दुःख

सोचों जरा

कैसा हादसा हुआ होगा

माटी यूँ ही नहीं

पर्वत बना होगा

जड़ ज़मीन पर

शिखर आसमान पर

कितना बँटा–बँटा

किसी का न हो सका होगा

सोचों जरा

कितना हैरान हुआ होगा

उसके सीने से

दर्द का सोता

फूट पड़ा होगा

कहीं नदियाँ

कहीं झरने

बन कर आसुओं की धार

न जाने कितनी

घाटियों में गिरा होगा

माटी यूँ ही नहीं

पर्वत हुआ होगा

सोचों जरा

कितना फूट फूट कर

रोया होगा

एक ही वक्त में

कहीं ठिठुरता

कहीं सुलगता

कहीं चटकता

कहीं खिसकता

कितना परेशान

हुआ होगा

माटी यूँ ही नहीँ

पर्वत बना होगा

सोचों जरा

उसका दुःख

कितना बड़ा होगा

कैसी है जिजीविषा

किस तरह

सीना ताने

खड़ा हुआ होगा

माटी यूँ ही नहीं

पर्वत बना होगा ——-

About पूनम सिन्हा

M.Sc. Zoology

One Reply to “पर्वत का दुःख”

  1. Hi Poonam Ji, a good poetry on “MAATI”. Liked it. Keep writing on nature.
    all the best.

    Ruk jaayegi jis din ye kalam
    ruk jaaayebnge tere chalet Kadam

    apne ghavon par lagakar marham
    dukh ke mitaa de saare bharam

    kishan

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