प्रेम सेतु

मैं और तुम हैं नदी के दो किनारे,
जिन्हें खुदा भी जोड़ नहीं सकता।

मगर मैंने तो थामा है हाथ तुम्हारा,
जिसे मैं कभी छोड़ नहीं सकता।

प्रेम बनेगा सेतु हम दो तटों के बीच,
जिसे सैलाब भी तोड़ नहीं सकता।

तटों के बीच बहती प्रेम धारा को,
प्रचंड तूफ़ान भी मोड़ नहीं सकता।

मैं और तुम हैं नदी के दो किनारे,
जिन्हें खुदा भी जोड़ नहीं सकता।

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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