फासलों में माधूर्य

फासलों में माधूर्य

इन फासलों में पनपता है माधूर्य का अनुराग….

बोझिल सा होता है जब ये मन,
थककर जब चूर हो जाता है ये बदन,
बहती हुई रक्त शिराओं में,
छोड़ जाती है कितने ही अवसाद के कण,
तब आती है फासलों से चलकर यादें,
मन को देती हैं माधूर्य के कितने ही एहसास,
हाँ, तब उस पल तुम होती हो मेरे कितने ही पास….

इन फासलों में पनपता है माधूर्य का अनुराग…..

अनियंत्रित जब होती है ये धड़कन,
उलझती जाती है जब हृदय की कम्पन,
बेवश करती है कितनी ही बातें,
राहों में हर तरफ बिखरे से दिखते है काँटे,
तब आती है फासलों से चलकर यादें,
मखमली वो छुअन देती है माधूर्य के एहसास,
हाँ, तब उस पल तुम होती हो मेरे कितने ही पास….

इन फासलों में पनपता है माधूर्य का अनुराग…..

About Purushottam kumar Sinha

A Banker, working in Allahabad Bank. Having interest in Poem Writing and Reading. Living in Patna, Bihar
शायद मन ही है यह मेरा……आपके समक्ष प्रस्तुत….. फिर सोचता हूँ कभी! मन क्या है?
मन जैसी कोई चीज है भी क्या? खुशी के एहसास, दुःख का आभाष, शरीर के अन्दर होता हैं कहाँ?
क्या तन्तुओ और कोशिकाओं मे? इन्हें कौन दिग्दर्शित करता है? शायद मन है क्या वह?
सोचता हूँ कभी! मन का कोई आकार भी है क्या?
ठोस, द्रव्य, नर्म, मुलायम या कुछ और? एहसास सुख के करता कहाँ? दुःख का आभाष होता इसे कैसे? मन टूटने पर पीड़ा तो होती है, पर टूटने की आवाज क्युँ नही होती? मन जैसी कोई चीज है भी क्या?
सोचता हूँ कभी! पत्थर टूटे तो होता घना शोर, शीशा टूटने से होती चनकार सी, कागज फटने से होती सरसराहट सी, पत्तों के टूटने से होता मंद शोर, फूलों के मसलने की भी होती सिसकी,
पर इस मन के टूटने से?
मन के टूटने से उठती है कराह!!!!! मस्तिष्क के तार झंकृत हो उठते हैं, क्षण भर को शरीर शिथिल हो जाता है, पत्थरों के दिल भी भेद जाते हैं, आसमान से बूँद छलक पड़ते हैं, शायद मन सबसे कठोर होता है!
शायद मन ही है यह मेरा……आपके समक्ष प्रस्तुत…..

My Blogspot… कविता “जीवन कलश”
https://purushottamjeevankalash.blogspot.com
मुझे आप www.poemocean.com, www.hindilekhak.com पर भी पढ सकते हैं।

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