फिर आखिर तुम क्यों आये

फिर आखिर तुम क्यों आये

आज बता दो मुझसे मिलने, फिर आखिर तुम क्यों आये।
जब वक़्त हमारा बीत गया, फिर आखिर तुम क्यों आये।
#सीख लिया है हमने तुम बिन, जीना अब इस सूने जग में।
रुकना भी जायज ना था तो,चलने लगे तनहा पग में।
खूँ भी सर्द सा ठहरता है यही कही शीतल होकर,
तेरी याद भी जब बहने लगी,अब संग लहू के मेरे रग में।
बस एक बेचारी यादो को जिन्दा करने, फिर आखिर तुम क्यों आये।
आज बता दो….।
#मेरे दिल का ठौर ठिकाना , रब जाने या जाने ना कोई।
मैं तो हूँ “मैकश यहाँ पे, तू जाने या जाने ना कोई।
तू खुश हो जा पाकर उसको, जो तेरा ही प्यार है,
मेरी हालत खोकर तुझको, अब जाने या जाने ना कोई।
बस आज मुझे यूं तनहा करने, फिर आखिर तुम क्यों आये।
आज बता दो…।
#कल जब रोयेंगी नदिया इन आँखों की, तब इनमे सूनापन होगा।
सन्नाटो में जैसे रचते गीतों में,तब इनमे सूनापन होगा।
जब भी मेरी गजल को पढ़ना, बस उसमे खो जाना तुम,
उन भाव भरी,टूटी ग़ज़लो में भी, शायद एक सूनापन होगा।
बस आज मेरी गज़लों में सजने, फिर आखिर तुम क्यों आये।
आज बता दो……।

‘मैकश’

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