बचपन की वह अक्षुण्ण यादें


बचपन की वह अनछुई यादें
तड़पाती हैं जो व्याकुल मन को आज भी
तेरा वह चपल अल्हड़पन
वो नादानी और
वो चंचल लड़कपन
क्या भूल पाऊंगा कभी
पनघट की पगडंडियों पर
धानी चुनरिया लहरा के इठलाना
अधजल गगरी कमर में लटकाये
मटक-मटक कर तेरा वह पग धरना
रिम-झिम बूंदों संग
तेरा वह राग मेघ गुनगुनाना
भूल पाऊँगा कैसे
तेरी वह मंद-मंद शरारत भरी मुस्कान
घायल किया जिसने
न जाने कितने पथिकों को
कितने मुसाफिरों को
घायल है आज भी मेरा नादान दिल
उन तीखे बाणों से
चलाये थे तूने जो अपनी उन्मत आँखों से
काश! भूल पाता उन पुरानी यादों को
मैं तो शायद भूल भी जाऊं
पर ये कैसे समझाऊँ इस निष्ठुर दिल को
जो था पागल तेरे अनुराग में
सावन भी जब था शरमाया
देख तेरे लहराते घुंघराले बालों को
नील गगन भी जब था भरमाया
देख तेरे कमसिन यौवन को
रंगबिरसंगी तितलियों संग
तेरी वह प्रेम-क्रीड़ा
पर भूल न पाता ये अनुरागी मन
नटखट बालपन के उन
अविस्मरणीय पलों को
चिरस्मरणीय क्षणों को

(किशन नेगी) 

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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