बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

कर गया वो पराया अपने घरों को।

 

कहाँ तक उड़े चले जाते हैं देखें

आस्मां मिला है टूटे हुए परों को।

 

बहा है लहू किसके सरों का, देखो

उठाकर फेंके हुए इन पत्थरों को।

 

क्या पता कि वोह सोया भी था कि नहीं

छोड़ गया है वो गूँगे बिस्तरों को।

 

बहुत लहूलुहान हो गया है बिचारा

समझाये कोई तो अब ठोकरों को।

 

ये कलियाँ शबनम भरी सिसकती रहीं

कहीं काँटे ना चुभ जायें भ्रमरों को।

 

वोह मुस्कान तेरे लबों को छूकर

चूम चूम जाती है मेरे अधरों को।

                   …. भूपेन्द्र कुमार दवे 

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